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Wednesday, 20 March 2013

ब्रां‍काइटिस की आयुर्वेदिक चिकित्सा


चिंता विकार के लिए अश्वगंधा


tanav ki chikitsa ke liyeahswagandha
चिंता की प्रकृति के अनुसार, वह एक उपयोगी उद्देश्य से कार्यं करती है। हमारी सुरक्षा की समझ को धमकाने वाली स्थिती की प्रतिक्रिया के रुप में कभी कभी सामान्य चिंता होती हैं, इसे किसी बुरी घटना के घटीत होने के डर या चिंता के द्वारा चित्रित किया जाता हैं। चिंता हमें नुकसान से बचने में और भविष्य में खुद को उसी समान संभावित खतरनाक स्थिति में नहीं डालना याद रखने में मदद करती है। चिंता, एक मानव विकास के दौरान संरक्षित की गयी एक सामान्य तनाव प्रतिक्रिया हैं, और अन्य सभी पशुओं में प्रकट रुप में दिखती हैं।

हालांकि, जब चिंता सामान्य रोजमर्रा की घटनाओं के जवाब में अनुपयुक्त रुप में आती हैं, तब यह एक गंभीर चिंता विकार का रूप ले सकती है। चिंता विकारों के कारण एक व्यक्ति, उनकी शारीरीक या मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर संभावीत आनेवाले खतरे को लेकर अशांति और चिंता की स्थिती में चला जाता हैं। चिंता विकारों के लक्षण अक्सर दीर्घकालीन होते हैं, और उसमे ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, ज्यादा चिड़चिड़ापन, मांसपेशियों में तनाव, अशांत नींद  और चिंताओं पर काबू पाने में परेशानी, आदी शामिल हैं।

आयुर्वेदिक चिकित्सा में परंपरागत रुप से विभिन्न रोगों के इलाज के लिए बड़े पैमाने पर उपयोग किये जाने वाली अश्वगंधा एक जड़ी बूटी है। आयुर्वेदिक उपचार में इस पौधे की जड़ें, पत्तियां और फल इस्तेमाल किये जाते हैं। रोमन इसे अपने वाइन में डालते थे ऐसी कहावत हैं। इसका लैटिन नाम 'विथानिआ सोमनिफेरा' है। यह चिंता विकार, अवसाद और अन्य मानसिक विकारों के उपचार में लाभकारी हैं, ऐसा पाया गया हैं। आयुर्वेदिक उपचारों में वर्षों से इस पौधे की जड़ों, पत्तियों और फलों को इस्तेमाल किया गया हैं। अब वैज्ञानिक अध्ययन ने यह पुष्टि की है कि इसमें कई औषधीय गुण हैं। यह
  • चिंता विकार को कम करती हैं।
  • एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करती हैं।
  • मस्तिष्क कार्य में सुधार करती हैं।
  • जीवाणुरोधी गुण हैं।
  • कोर्टिसोल के स्तर को कम करती है।
  • यौन जीवन शक्ति बढ़ाती हैं।

आधुनिक जीवन नें उच्च स्तरीय नौकरियों में बहुत तनाव निर्माण किया हैं और 80 प्रतिशत लोगों का मानना हैं कि तनाव के कारण उनके जीवन में प्रमुख कठिनाइ है, हमे तनाव को कम और प्रबंधन करने के साथ कोर्टिसोल के स्तरों को कम करने के लिए एक स्वस्थ तरिके की जरूरत हैं।  मृत्यु या तनाव के हार्मोन के रूप में कोर्टिसोल को जाना जाता हैं।

अश्वगंधा किसी भी हानिकारक दुष्प्रभावों के बिना चिंता और तनाव को कम करने का एक प्राकृतिक और सुरक्षित तरीका हैं।

एक अध्ययन में अश्वगंधा के अवसाद विरोधी परिणाम की तुलना, पर्चेवाली अवसाद विरोधी लोराझेपान और इमिप्रामिने  जैसी दवाओं से की।

और दिलचस्प बात यह सामने आयी कि चिंता और अवसाद पर उसके प्रभाव आधुनिक दवाओं के लिए तुलनीय हैं और यह आयुर्वेदिक दावें आधुनिक हर्बल अनुसंधान द्वारा विधिमान्य किये गये।

उन्मादी अवसाद में, शराबी संविभ्रम और स्किट्सफ्रीनीआ (एक प्रकार का पागलपन) से प्रभावित व्यक्तियों को प्रति किलो के लिए 100 मिलीग्राम की एक खुराक से राहत मिलती हैं।

अश्वगंधा का जॉर्ज वॉशिंगटन स्कूल ऑफ मेडिसिन अँड हेल्थ सायंस और कुछ अन्य अमेरिकी परीक्षण केंद्रो में नैदानिक परीक्षणों का उपयोग करके उसकी सुरक्षितता और प्रभावशीलता की जांच की गयी हैं।  और उन्होने यह  प्रमाणित किया है कि अश्वगंधा में किसी भी विषाक्तता या दुष्प्रभावों के बिना चिंता दुर करने वाले और अवसाद विरोधी गुण हैं।

एक परीक्षण में, चिंता न्युरोसिस(तंत्रिका रोग) से पीड़ित 30  रोगियों को एक महीने के लिए प्रति दिन 40 मिलीग्राम अश्वगंधा की खुराक दी गयी। परीक्षण से पता चला कि ज्यादातर चिंता विकार के लक्षण जैसे घबड़ाहट या डर में बहुत कमी आयी थी।

अमेरिकी मनोचिकित्सकों द्वारा एक अन्य परीक्षण में यह पाया गया कि उन्मत्त अवसादग्रस्त के इलाज में, शराबी शराबी संविभ्रम और स्किट्सफ्रीनीआ (एक प्रकार का पागलपन) से पीड़ित लोगों में हररोज 4 कैप्सूल भोजन के बीच में 60 दिनों तक लेना उपयोगी पाया गया।

क्योंकि कई लोग अवसाद विरोधी दवा का इस्तेमाल करते हैं, दुष्प्रभावों के बिना प्राकृतिक उपचार का इस्तेमाल सकारात्मक रुप से लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता हैं। अश्वगंधा आधुनिक दुनिया के तनावों के लिए प्रतिविष हो सकती हैं।

मस्सों की आयुर्वेदिक चिकित्सा

लाखों लोग त्वचा की समस्याओं से ग्रसित रहते हैं। इनमे से कुछ समस्याएँ गंभीर होती हैं, और कुछ गौण समझी जाती हैं, और इन गौण समस्याओं में से एक समस्या  होती है, मस्से। यह सिर्फ गौण ही नहीं बल्कि आम समस्याओं में गिनी जाती है। मस्से त्वचा पर एक उपज की तरह होते हैं, और सुसाध्य समझे जाते हैं,  यानि कि वे कैंसरयुक्त नहीं होते। इसके बावजूद इनसे ग्रसित कई लोग इन्हें निकालने के लिए आतुर रहते हैं, क्योंकि उनके अनुसार मस्से त्वचा पर अच्छे नहीं दिखते।


यह बात आप शायद न जानते हों कि मस्से 'ह्युमन पैपिल्लोमा वाइरस' के कारण विकसित होते हैं।  

मस्सों के लक्षण

त्वचा पर बेडौल और रुखी सतह का विकास होना, मस्सों के लक्षण होते हैं। मस्से अपने आप विकसित होकर अपने आप ही गायब हो जाते हैं, पर इनमे से कई मस्से अत्याधिक पीड़ादायक होते हैं। यह तेज़ी से फैलते हैं, और इनमे से कई मस्से बरसों तक बने रहते हैं जिनका इलाज कराना ज़रूरी होता है।

मस्सों के आयुर्वेदिक / घरेलू उपचार
  • बरगद के पेड़ के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इस प्रयोग से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं। 
  • एक चम्मच कोथमीर के रस में एक चुटकी हल्दी डालकर सेवन करने से मस्सों से राहत मिलती है।
  • कच्चे आलू का एक स्लाइस नियमित रूप से दस मिनट तक मस्से पर लगाकर रखने से मस्सों से छुटकारा मिल जायेगा।
  • केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। और ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें जब तक कि मस्से ख़तम नहीं हो जाते।
  • अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगायें। इससे मस्से नरम पड़ जायेंगे, और धीरे धीरे गायब हो जायेंगे। अरंडी के तेल के बदले कपूर के तेल का भी प्रयोग कर सकते हैं।
  • लहसून के एक टुकड़े को पीस लें, लेकिन बहुत महीन नहीं, और इस पीसे हुए लहसून को मस्से पर रखकर पट्टी से बांध लें। इससे भी मस्सों के उपचार में सहायता मिलती है।
  • एक बूँद ताजे  मौसमी का रस मस्से पर लगा दें, और इसे भी पट्टी से बांध लें। ऐसा दिन में लगभग 3 या 4 बार करें। ऐसा करने से मस्से गायब हो जायेंगे।
  • बंगला, मलबारी, कपूरी, या नागरबेल के पत्ते के डंठल का रस मस्से  पर लगाने से मस्से झड़ जाते हैं। अगर तब भी न झड़ें, तो पान में खाने का चूना मिलाकर घिसें।
  • अम्लाकी को मस्सों पर तब तक मलते रहें जब तक मस्से उस रस को सोख न लें। या अम्लाकी के रस को मस्से पर मल कर पट्टी से बांध लें.
  • कसीसादी तेल मस्सों पर रखकर पट्टी से बांध लें।
  • मस्सों पर नियमित रूप से प्याज़ मलने से भी मस्से गायब हो जाते हैं।
  • पपीता के क्षीर को मस्सों पर लगाने से भी मस्सों के गायब होने में मदद मिलती है।
  • थूहर का दूध या कार्बोलिक एसिड सावधानीपूर्वक लगाने से मस्से निकल जाते हैं।
  • मस्सों पर अलो वेरा को दिन  में तीन बार लगायें। ऐसा एक सप्ताह तक करते रहें, मस्से गायब हो जायेंगे।
  • विटामिन इ को मस्सों पर लगाने से भी लाभ मिलता है। दुगने लाभ के लिए आप उसपर कच्चा लहसून भी लगा सकते हैं। दोनों को मस्सों पर लगाकर उसपर पट्टी बांधकर एक सप्ताह तक रहने दें। एक सप्ताह बाद पट्टी खोलने पर आप पाएंगे की मस्से गायब हो गए हैं। 

वार्म जनित रोगों की आयुर्वेदिक चिकित्सा


ayurveda se worm janit rogo ka upchar हमारा शरीर विभिन्न प्रकार के कृमियों की मेज़बानी करता है जिसके कारण शरीर में कई रोग पैदा होते हैं । यह कृमि हमारे शरीर में बासी खान पान और दूषित पानी के द्वारा, या त्वचा के ज़रिये घुसते हैं। कच्ची और अधपकी सब्जियां और अधपके मांस के सेवन से कृमि शरीर में विकसित होते हैं और बढ़ते हैं और यह कृमि फ़्लैट वर्म या राउंड वर्म के नाम से जाने जाते हैं ।

कृमि रोग के  लक्षण और संकेत

शरीर में कृमि की मौजूदगी के लक्षण कृमि के प्रकार के आधार पर होते हैं । कुछ कृमि कब्ज़ियत या दस्त के साथ उदर में पीड़ा के कारण बनते हैं। हुकवर्म रक्त चूसते हैं और शरीर में खून की कमी का कारण बनते हैं। राउंड वर्म खाँसी, उल्टियां, और भूख की कमी का कारण बनते हैं। कुछ रोगियों में बुखार और ब्रोंकाइटिस के विकसित होने की भी संभावना बनती है।    

कृमि-रोग के आयुर्वेदिक / घरेलू उपचार
  • सुबह उठते ही 20 ग्राम गुड़ का सेवन करें।  उसके 30 मिनट के बाद ठंडे पानी के साथ 1  ग्राम अजवाइन   का प्रयोग करें। इससे आपकी अंतड़ियों के कृमि निष्काषित हो जायेंगे। 
  • प्याज के रस के सेवन से बच्चों के पेट से थ्रेडवर्म निष्काषित हो जायेंगे।
  • 2 चम्मच  नींबू के रस के साथ 1 या 2 ग्राम कच्ची सुपाड़ी की लेई का सेवन करने से भी लाभ मिलता है ।
  • कच्चे पपीते  के 4 चम्मच ताज़ा क्षीर एक चम्मच शहद और 4 चम्मच उबले पानी के साथ लें। यह राऊंड वर्म के निष्काशन के लिए एक असरदार कृमिहर का काम करता है।
  • 3 से 6 ग्राम अनार के छिलके का पाउडर शक्कर के साथ लें और उसके एक घंटे बाद रेचक औषधि का सेवन करें। इससे राउंड वर्म और टेप वर्म का निष्काशन आसानी से हो जाता है।
  • कृमि कुठार रस, कृमि मुद्गर रस, कृमिहर रस आयुर्वेद कृमि रोग की अत्यधिक महत्वपूर्ण औषधियों में गिनी जाती हैं। पर इन औषधियों का प्रयोग अपने चिकित्सक की सलाह के बिना न करें।   
  • खजूर के पत्तों का स्वरस और नींबू का स्वरस 20-20 ग्राम मिलाकर पिलायें। आयु के साथ मात्रा घटा-बढ़ा सकते हैं। यह  मल के कृमि नष्ट करने में लाभकारी होता है।
  • पलाश के बीज भी कृमिनाश में उपयोगी होते हैं। उन्हें अजवाइन  के साथ मिला कर  देने पर उनका प्रभाव बढ़ जाता है।
  • केवल काँजी का पानी पिलाने से भी उदर-कृमि नष्ट हो जाते हैं।  
  • अधिकतर दिनों के लिए ताज़े फलों के साथ संतुलित आहार का सेवन करना चाहिए।
  • सुबह खाली पेट कद्दूकस की हुई गाजर का एक कप सेवन करने से अंतड़ियों के कृमि नष्ट हो जाते हैं। 
  • लहसून के तीन टुकड़े चबाने से भी अंतड़ियों के कृमि नष्ट हो जाते हैं।
  • अपने खान पान में लहसून और हरिद्र की मात्रा बढ़ा दें। करेले, नीम, सिंघियों का सेवन अधिक करें। शक्कर और गन्ने के रस का सेवन बिल्कुल भी ना करें।
  • मल और मूत्र त्याग की इच्छा को दबाकर न रखें। कब्ज़ियत से बचें। हफ्ते में एक बार अनशन करने से अंतड़ियों में कृमि प्रजनन को रोका जा सकता है। उँगलियों के नाख़ून छोटे और साफ़ रखें।
  • सड़क के किनारे खोमचे में बेचने वाले खाद्य पदार्थ अक्सर दूषित होते है। उन्हें बेचने वालों के भी हाथ साफ़ नहीं रहते। अतः उनलोगों से कुछ खाने की सामग्री खरीदने के पहले सौ बार सोचें एवं उनकी सफाई से पूरी तरह  संतुष्ट होने के बाद हीं उनकी कोई खाद्य सामग्री खरीदें।

गठिया में आयुर्वेद उपचार

थायराइड के लिए अश्वगंधा


Thyroid ki chikitsa ke liye ahswagandha in hindi थायरॉयड, गर्दन में स्थित एक ग्रंथि होती हैं और वह थायरोक्सिन नाम के हार्मोन का उत्पादन करती हैं, जो शरीर की चयापचय प्रक्रिया को विनियमित करने में मदद करता है। थायरोक्सिन हार्मोन (हाइपोथायरायडिज्म) की कमी से बच्चों में बौनापन और वयस्कों में सबकटॅनेअस चरबी बढ़ जाती हैं।  और अतिरिक्त (हायपरथायरोडिझम) हार्मोन गण्डमाला का कारण बनता हैं। हायपरथायरोडिझम  की स्थिती 30 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं में ज्यादा आम  पायी जाती हैं। इसके लक्षणों में, गुस्सा, ज्यादा चिंता, दिल के धडकन का तेज दर, गहरा या उथला श्वसन, मासिक धर्म में बाधा, थकान और उभरी हुई आँखें आदी दिखते हैं। हालांकि यह सभी लक्षण एक साथ प्रकट नहीं हो सकते है,  उनमें से कोई एक हायपरथायरोडिझम का संकेत हो सकता हैं।

थायरोक्सिन की निष्क्रियता के कारण हाइपोथायरायडिज्म हो सकता हैं, आयोडीन की कमी या थायराइड विफलता के कारण थकान, सुस्ती और हार्मोनल असंतुलन होता है। अगर अनुपचारित छोड़ दिया जाये,  तो यह मायक्झोएडेमा का कारण बन सकती हैं, जिसमें त्वचा और ऊतकों में सूजन होती हैं।

आयुर्वेदिक उपचार में इस्तेमाल की जाने वाली अश्वगंधा, जड़ी बूटी इस रोग के दोनों रुपों, हायपर और हायपो के लिए जवाब साबित हो सकती हैं। यह भारत, अफ्रीका और भूमध्य सागर के सुखे क्षेत्रों में बढ़ती हैं।  और इसका लैटिन नाम विथानिआ सोमनिफेरा हैं।

नीचे चार कारण दिये गये हैं, जिस के कारण इसका इस्तेमाल थाइरोइड के लिए किया जा सकता हैं।
  1. यह आपके शरीर के साथ काम करती हैं, उसके खिलाफ नहीं।
  2. यह एक एडाप्टोजेन हैं, एक हर्बल उत्पाद, जो शरीर की तनाव, आघात, चिंता और थकान के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता हैं। एडाप्टोजेन एक पुनः निर्माण करने वाली जड़ी बूटी हैं, आयुर्वेदिक संदर्भ में 'रसायना' और बलवर्धक  हैं। यह पुष्टिकारक औषधी (टॉनिक) जड़ी बूटी भी हैं और नियमित रूप से ली जा सकती हैं। और वह अंतःस्त्रावी  प्रणाली (हार्मोन) को ठीक भी करती हैं, जिससे व्यक्ति को हार्मोनल संतुलन की पुनःप्राप्ती होने में मदद मिलती हैं, और बेहतर महसूस होता हैं।
  3. अश्वगंधा का उपयोग कर रहे  व्यक्तियों के उपाख्यानात्मक सबूत और वास्तविक अनुभव यह दर्शाते हैं, कि एडाप्टोजेन सभी प्रकार के लोगों पर, इतना ही नही विशेष बीमारी के चरम से पीड़ित लोगों पर भी कारगर हैं। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति इसे एक मंद थाइरोइड को सही करने के लिए ले सकता है, जबकि दुसरा अन्य इसका उपयोग अपने अति सक्रिय थाइरोईड के इलाज के लिए ले सकता हैं।
  4. वैज्ञानिकों को इन निरिक्षणों ने चौका दिया हैं, क्योंकि इसका शरीर पर एक समग्र प्रभाव हैं। अलग और तटस्थ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को, इस बड़ी पहेली को हल करना मुश्किल लगता हैं

यह जड़ी बूटी एक टॉनिक के रूप में हजारों वर्षों से इस्तेमाल की जा रही हैं, इसलिए इसको एक व्यक्ती दीर्घ अवधि के लिए, किसी दुष्प्रभाव की संभावना के बिना उपयोग कर सकता हैं।

प्रति दिन 200 से 1200 मिलीग्राम की छोटीसी खुराक आपको लेनी चाहिए। यदि गंध अनचाही हैं, तो यह एक चाय के साथ मिलाकर जिसे उत्तेजक गर्म पेय बनाने के लिए तुलसी मिलायी जा सकती हैं या सूथी(ताजे फलो के रस के साथ आईसक्रिम, दही या दुध मिलाकर बनाया एक गाढा मुलायम पेय) में लिया जा सकता हैं।

उपचार प्रभावी हो रहा हैं, यह निर्धारित करने के लिए अपने थायराइड हार्मोन की जाँच करना और 2 से 3 महीने की अवधि के बाद एक सकारात्मक बदलाव के लिए उनकी फिर से जाँच कराना एक सर्वोत्तम तरीका हैं। ये परीक्षण किसी भी अच्छे स्वास्थ्य व्यवसायी द्वारा किया जा सकते हैं। इस तरह से आप तय कर सकते हैं कि, क्या यह आपके लिए अच्छा हैं, या आपको इसे बंद करके दुसरे किसी उपचार के लिए अपना समय और पैसा खर्च करना चाहिए।

किसी भी मामले में, अगर आप अश्वगंधा का उपयोग शुरू करना चाहते हैं, तो अपने परिवार के चिकित्सक के साथ पहले इसके बारे में चर्चा करना एक अच्छा विचार हैं।

पीठ दर्द में आयुर्वेदिक उपचार


Back painआज की भाग दौड़ की जिंदगी में पीठ दर्द होना एक आम समस्या है। पीठ दर्द के कई कारण होते हैं। सर्जिकल डिलेवरी,गलत तरीक से सोने या उठने-बैठने के कारण। महिलाओं में आमतौर पर ऊंची हील सैंडिंल पहनने से कमर दर्द के होने की संभावना रहती हैं। पीठ दर्द के लिए भी इलाज उपलब्ध है, फिर वह चाहे एलोपैथी में हो या आयुर्वेद में। आयुर्वेदिक चिकित्सा में पीठ दर्द का स्था यी इलाज भी मौजूद है। आयुर्वेद के हिसाब से कमर दर्द का मुख्य कारण कब्ज है, जिसे आयुर्वेदिक इलाज से आसानी से ठीक किया जा सकता है। आइए जानें पीठ दर्द के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में।
  • आयुर्वेद में कुछ ऐसी औषधियों के विषय में बताया गया है, जिनका प्रयोग कर पीठ दर्द से निजात पाई जा सकती हैं।
  • कमर दर्द होने पर दशमूल काढ़ा सुबह शाम पानी से पीना चाहिए। कमर दर्द का मूल कारण कब्ज माना गया है, इसलिए कब्ज होने पर अरण्डी तेल रात में 15 एमएम लेना चाहिए।
  • रात में गेहूँ के दाने को पानी में भिगोकर सुबह इन्हें खसखस और धनिये के दाने के साथ दूध में डालकर चटनी बनाकर सप्ताह में दो बार खाने से न सिर्फ कमर दर्द जाता है बल्कि शरीर में ताकत भी बढ़ती है।
  • आयुर्वेदिक महाविषगर्भ तेल और महानारयण तेल दोनों मिलाकर कमर की मालिश करने से कमर दर्द में आराम मिलता है।
  • दर्द कम करने के लिए अनेक आयुर्वेदिक औषधियां उपलब्ध है जिनमें विभिन्न प्रकार के गुग्गलु, बासवेलिया सेरेटा, अश्वधगंध चूर्ण, शुद्ध शिलाजीत, बलारिष्ट इत्यादि के साथ ही ग्लूगकोसामीन हाईड्रोक्लोराइड तथा बासवेलिया सेरोसा पीठ दर्द के निवारण में लाभप्रद है।
  • इन औषधियों का प्रयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा की देखरेख में करना जरूरी है।
  • पीठ दर्द मिटाने के लिए फिजियोथेरेपिस्ट से हल्के हाथों से मालिश करवानी चाहिए। इससे कशेरुकाएं अपनी सही जगह बैठ जाती हैं और दर्द से निजात मिलने में आसानी होती है।
  • पीठ दर्द से बचने के लिए जरूरी है कि कभी भी झुक कर भार न उठाएं, जब भी कुर्सी पर बैठे या चौकड़ी मारकर बैठे तो आगे की तरफ़ झुक न बैठें, घंटों तक बैठना हो तो बीच-बीच में मूव करते रहें।
  • 25 प्रतिशत कीबोर्ड ऑपरेटरों को कंप्यूटर पर काम करने से सर्वाइको ब्रैकियल सिंड्रोम हो जाता है। उनकी बांह, कंधे, पीठ और गर्दन की पेशियां और तंतु तनावमय रहते हैं इस परेशानी से बचने के लिए जरूरी है कि शरीर को नियमित व्यायाम से चुस्त-दुरुस्त रखें।
  • आमतौर पर पीठ दर्द आयु से संबंधी रोग है। आयु अधिक होने पर अन्य अस्थियों के साथ कशेरूक भी दुर्बल हो जाते हैं और उनमें कैल्शियम की कमी हो जाती है।
  • सही व्यायाम और आयुर्वेदिक औषधियों के सेवन के साथ-साथ सामान्य सावधानियां बरतते हुए पीठ दर्द से निजात पाई जा सकती है। 
पीठ दर्द के लिए सावधानियां
  • कमर दर्द के रोगी को हमेशा सख्त बिस्तर पर ही सोना चाहिए।
  • काम करते समय अपना शरीर बिल्कुल सीधा रखें।
  • पीठ पर हल्के हाथों से मालिश करें।
  • ज्यादा भारी सामान न उठाएं।
  • कमर के लिए रोजाना हल्की-फुल्की कसरत जरूर करें। 
  • खाने में कैल्शियम और विटामिन की मात्रा बढ़ा दें।

एसिडिटी के लिए आयुर्वेद

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Acidity ke liye ayurveda
मसालेदार चटपटा खाना किसे पसंद नहीं, ज्यादातर महिलाओं को तो चटपटा खाना ही पसंद  होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं चटपटा, मसालेदार खाना खाने से आप पेट की जलन यानी एसीडिटी से परेशान से हो सकते हैं। एसीडिटी के दौरान कई बार पेट में इतनी जलन होती है मानो कि पेट में आग लग गई है। एसीडिटी का इलाज भी संभव है लेकिन उसके लिए आपको चटपटे खाने से तौबा करनी होगी। क्या आप जानते हैं चिकित्सा की सभी पद्तियों में एसीडिटी का र्इलाज मौजूद है। आयुर्वेद में है ईलाज, होम्योपपैथी, एैलोपैथी और घरेलू नुस्खों से भी आप एसीडिटी से छुटकारा पा सकते हैं। आइए जानें एसीडिटी के लिए आयुर्वेदिक ईलाज के बारे में।


आयुर्वेद से एसीडिटी का इलाज
  • आंवला चूर्ण को एक महत्वपूर्ण औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आपको एसीडिटी की शिकायत होने पर सुबह- शाम आंवले का चूर्ण लेना चाहिए।
  • अदरक के सेवन से एसीडिटी से निजात मिल सकती हैं, इसके लिए आपको अदरक को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर गर्म पानी में उबालना चाहिए और फिर उसका पानी अदरक की चाय भी ले सकते हैं।
  • मुलैठी का चूर्ण या फिर इसका काढ़ा भी आपको एसीडिटी से निजात दिलाएगा इतना ही नहीं गले की जलन भी इस काढ़े से ठीक हो सकती है।
  • नीम की छाल को पीसकर उसका चूर्ण बनाकर पानी से लेने से एसीडिटी से निजात मिलती है। इतना ही नहीं यदि आप चूर्ण का सेवन नहीं करना चाहते तो रात को पानी में नीम की छाल भिगो दें और सुबह इसका पानी पीएं आपको इससे निजात मिलेगी।
  • मुनक्का या गुलकंद के सेवन से भी एसीडिटी से निजात पा सकते हैं, इसके लिए आप मुनक्का को दूध में उबालकर ले सकते हैं या फिर आप गुलकंद के बजाय मुनक्का भी दूध के साथ ले सकते हैं।
  • त्रि‍फला चूर्ण के सेवन से आपको एसीडिटी से छुटकारा मिलेगा, इसके लिए आपको चाहिए कि आप पानी के साथ त्रि‍फला चूर्ण लें या फिर आप दूध के साथ भी त्रि‍फला ले सकते हैं।
  • दूध के नियमित सेवन से आप एसीडिटी से निजात पा सकते हैं, इसके साथ ही आपको चाहिए कि आप चौलाई, करेला, धनिया, अनार, केला इत्यादि फलों का सेवन नियमित रूप से करें।
  • शंख भस्म, सूतशेखर रस, कामदुधा रस, धात्री लौह, प्रवाल पिष्टी इत्यादि औषधियों को मिलाकर आपको भोजन के बाद पानी के साथ लेना चाहिए।
  • इसके अलावा आप अश्वगंधा, बबूना , चन्दन, चिरायता, इलायची, अहरड, लहसुन, मेथी, सौंफ इत्यादि के सेवन से भी एसीडिटी की समस्या से निजात पा सकते हैं।

एसीडिटी दूर करने के अन्य उपाय
  • अधिक मात्रा में पानी पीना
  • पपीता खाएं
  • दही और ककड़ी खाएं
  • गाजर, पत्तागोभी, बथुआ, लौकी इत्‍यादि को मिक्‍स करके जूस लें।
  • पानी में नींबू और मिश्री मिलाकर दोपहर के खाने से पहले लें।
  • तनावमुक्त रहें और मानसिक रूप से स्वस्थ रहें।
  • नियमित रूप से व्यायाम करें।
  • दोपहर और रात के खाने के बीच सही अंतराल रखें।


एसीडिटी के कारण
  • नियमित रूप से चटपटा मसालेदार और जंकफूड का सेवन
  • अधिक एल्‍‍कोहल और नशीले पदार्थों का सेवन
  • लंबे समय तक दवाईयों का सेवन
  • शरीर में गर्मी बढ़-बढ़ जाना
  • बहुत देर रात भोजन करना
  • भोजन के बाद भी कुछ न कुछ खाना या लंबे समय तक भूखे रहकर एकदम बहुत सारा खाना खाना


एसीडिटी के लक्षण
  • एसीडिटी के तुरंत बाद पेट में जलन होने लगती है।
  • कड़वी और खट्टी डकारें आना
  • लगातार गैस बनना और सिर दर्द की शिकायत
  • उल्टी होने का अहसास और खाने का बाहर आने का अहसास होना
  • थकान और भारीपन महसूस होना

बालों के गिरने का आयुर्वेदिक उपचार


Treatment for hairसुंदरता को बढ़ाने में बालों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन जब बालों की देखभाल में लापरवाही बरती जाती है, तो बालों की समस्याएं उत्पन्न होनी शुरू हो जाती है। बालों का झडऩा ऐसी ही समस्या है, जो किसी को भी तनाव में डाल सकती है। आज हर दूसरे व्यक्ति को बालों की समस्या से जूझना पड़ता है। बाल गिरने का कारण कोई एक नहीं बल्कि कई हैं जैसे- तनाव , इन्फेक्शन ,हार्मोन्स का असंतुलन ,अपर्याप्त पोषण ,विटामिन और पोषक पदार्थों की कमी ,दवाओं के साइड इफेक्ट्स ,लापरवाही बरतना या बालों की सही देखभाल न होना ,घटिया क्वालिटी के शैम्पू का प्रयोग इत्यादि। बालों के गिरने का आयुर्वेदिक उपचार भी मौजूद है और यह फायदेमंद भी सिद्ध हुआ है। आइए जानें आखिर बालों के झड़ने के लिए आयुर्वेदिक उपचार कितना लाभकारी है।

  • शहद कई बीमारियों को दूर करने में सक्षम है। शहद के प्रयोग से बालों का झडऩा भी रोका जा सकता है।
  • दालचीनी भी बालों की समस्या को दूर करने का कारगर उपाय है। आयुर्वेद के अनुसार दालचीनी और शहद के मिश्रण से कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है।
  • बाल झड़ते हैं, तो गरम जैतून के तेल में एक चम्मच शहद और एक चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर उनका पेस्ट बनाएं। नहाने से पहले इस पेस्ट को सिर पर लगा लें और कुछ समय बाद सिर धो लें। इससे बालों की समस्या से निजात मिलेगी।
  • बालों में आमतौर पर कुछ समस्याएं जैसे-बालो का गिरना, सफेद बाल, डैण्ड्रफ, सिर की त्वचा के रोग इत्यादि शामिल हैं। लेकिन बालों की समस्या को थोड़ी सावधानी बरतकर आसानी से दूर किया जा सकता है।
  • मजबूत तथा स्वस्थ बालों के लिए तेल से मालिश आवश्यक है। सर की मालिश करने से बालों की जड़ो को पोषण मिलता है और बालों के झड़ने में कमी आती है।
  • सरसो के तेल में मेहंदी की पत्ती गर्म करें। ठंडा कर के बालों में लगायें, इससे बालों का झड़ना रूक सकता हैं।
  • आँवला,शिकाकाई पावडर को दही में मिलाए। यह मिश्रण बालों में लगाने से बालों की डीप कंडीशनिंग होती है।
  • बालों की देखभाल के साथ-साथ खाने-पीने का भी खास ध्यान रखें। फलों और सब्जि़यों का सेवन अधिक करें। शहद में अंडा मिलाकर लगाना भी बालों की सेहत के लिए अच्छा रहता है।
  • नीम की और बेर की पत्तियों को पीसकर नींबू डालकर लगाने और इसके लगातार प्रयोग से बालों का झड़ना बंद हो जाता हैं। 
  • बड़ के दूध में नींबू का रस मिलाकर निरंतर लगाने से बालों का झड़ना बंद हो जाता है।
  • ग्रीन टी से बालों के झड़ने को आसानी से रोका जा सकता है।
  • जड़ी बूटियों से बनी औषधी व तेल मालिश से बालों के झड़ने की समस्या को दूर किया जा सकता है।
  • बालों की समस्या को रोकने के लिए आयुर्वेद में बालों की मालिश को आवश्यक माना गया है। ऐसे में नारियल तेल या बादाम के तेल से सिर की अच्छी तरह से मालिश करनी चाहिए।
  • यदि आप तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों ध्रूमपान इत्यादि को त्याग देंगे तो आपके बालों का झड़ना अपने आप ही रूक जाएगा।

आयुर्वेद


तनाव के आयुर्वेदिक उपचार

तनाव के आयुर्वेदिक उपचार

तनाव क्या होता है?

तनाव आपके शरीर में उत्पन हुई एक सामान्य प्रतिक्रिया होती है जब  आप अपने आपको किसी संकट से घिरा पाते हैं या आपका मानसिक सुंतलन बिगड़ जाता है।

तनाव से जुड़ी प्रतिक्रिया आपको चुनौतियों का सामना करने में सहायता करती है। पर एक सीमा के बाद, यही तनाव कोई भी सहायता करना बंद कर देता है और आपके स्वास्थ्य, आपके मूड, आपकी उत्पादकता, आपके संबंधों और आपके जीवन की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर करता है। 

आयुर्वेद में तनाव के कई स्वरुप होते हैं जैसे कि मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक तनाव; और अलग अलग तरह के तनाव में अलग अलग तरह के उपचार की ज़रुरत पडती है। आयुर्वेद के हिसाब से मानसिक तनाव मस्तिष्क का ज़रुरत से ज़्यादा उपयोग,  या दुरूपयोग करने से होता है। मसलन अगर आप अधिक समय तक मानसिक कार्य करते हैं या कई घंटों तक कंप्यूटर पर काम  करते हैं तो आपकी मानसिक गतिविधियाँ, ऊर्जा, और दिमाग से जुड़े प्राण-वात तत्वों में असुंतलन पैदा होता है। और प्राण-वात के असुंतलन का पहला लक्षण होता है तनाव को संभालने में असर्मथता। जैसे जैसे तनाव बढ़ता है वैसे वैसे धी, धृति, और स्मृति जैसी मानसिक प्रक्रिया  में बदलाव  उत्पन  होता है, या ग्रहणशीलता, अवरोधन, सकारात्मक सोच, उत्साह और रात की नींद पर भी असर पड़ता है।  

तनाव के लक्षण

1.संज्ञानात्मक लक्षण
  • स्मरणशक्ति की समस्या।
  • एकाग्रता की कमी।
  • परखने में गलती।
  • नकारात्मक पहलू देखना।
  • अनवरत चिंता।
2.भावनात्मक लक्षण
  • मूड बदलना।
  • चिडचिडापन या गुस्सा।
  • बेचैनी, विश्राम न कर पाना।
  • पराजित महसूस करना।
  • अकेलेपन और अलगाव का एहसास।
  • डिप्रेशन या नाराजगी।
3.शारीरिक लक्षण
  • दर्द और पीड़ा।
  • दस्त या कब्ज़ियत।
  • मतली या चक्कर।
  • यौन रूचि  में कमी।
  • बार बार सर्दी ज़ुकाम का होना।
  • अपचन और गड़गड़ाहट।
  • हृदयगति में तेज़ी।  
4.स्वाभाव से जुड़े लक्षण
  • कम या ज़्यादा खाना या सोना।
  • अपने आपको दूसरों से अलग थलग रखना।
  • कोई भी ज़िम्मेदारी लेने से बचना।
  • विश्राम के लिए मदिरापान, धूम्रपान या नशीली दवाओं का सेवन करना।
  • तनाव के लिए  घरेलू और आयुर्वेदिक चिकित्सा
  • अपने आहार में गर्म दूध के साथ पांच बादामों का समावेश करें ।  आप दिन में  2 या 3  बार दूध  या शहद के साथ 1 ग्राम काली मिर्च का सेवन भी कर सकते हैं।
  • अपने माथे पर नीम का पाउडर लगाने से भी आपको लाभ मिल सकता है।
  • दूध या पानी  के साथ सूखी अदरक का लेप बना लें और अपने माथे पर लगायें।
  • एक छोटे तौलिये को ठंडे पानी में डुबोकर निचोड़ लें और कुछ समय के लिए अपने माथे पर रखें।
  • क्षीरबाला तेल, धन्वन्तरी तेल या नारियल के तेल से पूरे शरीर की मालिश करवाने से भी तनाव कम होने में लाभ मिलता है। 
  • सोने से पहले दूध में गुलकंद मिलाकर पीने से भी लाभ मिलता है।
  • दोपहर में खाने के साथ मीठे  लस्सी में गुलकंद डालकर पीने से भी लाभ मिलता है।
  • एक अँधेरे कमरे में  लेटने से या करीबन आधा घंटा सोने से भी तानव में कमी आ सकती है।
  • पान के पत्तों में पीड़ानाशक और ठंडक पहुँचाने वाले गुण होते हैं।  इन्हें ग्रसित जगह पर रखने से काफी लाभ मिलता है।  
  • अश्वगंधा, ब्राह्मी, अदरक, हाइपरआइसिन जैसी आयुर्वेदिक औषधियां भी तनाव कम करने में लाभदायक सिद्ध होती हैं।
  • कुछ खान पान जैसे कि बादाम, नारियल, और सेब जैसे मीठे और रसीले फल, लस्सी, घी, ताज़ी चीज़ और पनीर भी तनाव की अवस्था को ठीक करने में मदद करते हैं।     
क्या करें क्या न करें
  • नकारात्मक सोच का त्याग करें।
  • मदिरापान और नशीले पदार्थों का सेवन न करें क्योंकि दोनों ही आपकी डिप्रेशन को बढ़ा सकते हैं।
  • जब आप डिप्रेशन में हों तो कोई भी  बड़ा फैसला लेने का प्रयास न करें।
  • अपने आपको निरुत्साह न होने दें।
  • कम से कम आठ घंटे की नींद तो ज़रूर लें।
  • रात को दस बजे से पहले सोने का प्रयास करें।
तनाव हममे से अधिकतर  लोगों की ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुका है, और अगर इसे ठीक तरह से संभाला नहीं जाये तो हृदय रोग, पेप्टिक अल्सर, और कैंसर होने की संभावना बन सकती है।